Sunday, September 25, 2011

बहाना...


परिंदे  लौट   आये  हैं  घरों  को 
उसे  भी  लौट  आना  चाहिए  था 
 भला  ऐसे  भी  कोई  रूठता  है 
उसे  तो  बस  बहाना  चाहिए  था ..!!

4 comments:

डॉ टी एस दराल said...

किस परिपेक्ष में लिखा है , यह तो समझ नहीं आ रहा । लेकिन सुन्दर पंक्तियाँ हैं ।

डॉ0 ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Dr. Zakir Ali 'Rajnish') said...

सुंदर...

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आप चलेंगे इस महाकुंभ में...?
...खींच लो जुबान उसकी।

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

.



उसे भी लौट आना चाहिए था …
ज़रूर लौट आना चाहिए था …
लेकिन इंतज़ार का भी अपना आनन्द है :)

रजनीश भाई
बधाई इस बात के लिए कि आपने चाहे चार पंक्तियां ही लिखीं … लेकिन पूरी तरह लय में , मुकम्मल बह्र में है ।
मेरे शहर के किसी रचनाकार को छंद में ढंग का लिखते देख कर मुझे बहुत ख़ुशी होती है ।
आपके लिए मंगलकामनाएं हैं !

नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाओं सहित
-राजेन्द्र स्वर्णकार

RAJNISH PARIHAR said...

धन्यवाद दराल जी ,राजेंद्र जी और जाकिर जी......